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बरसाती नेता

Posted On: 30 Apr, 2015  
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झपसु मियाँ… ( एक सच्ची घटना)

Posted On: 7 Apr, 2015  
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Others social issues में

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समाजवाद का अंतिम निष्कर्ष..

Posted On: 22 Feb, 2015  
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Others कविता में

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गिरगिट

Posted On: 29 Nov, 2014  
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तुम आदमी क्यों नहीं हो….

Posted On: 17 Sep, 2014  
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चलो हिन्दी दिवस मनाते है..

Posted On: 15 Sep, 2014  
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भस्मासुरी मीडिया को कौन रोकेेगा?

Posted On: 11 May, 2014  
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अब कहां अंधेरों से डर लगता है?

Posted On: 20 Feb, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: arunsathi arunsathi

के द्वारा: arunsathi arunsathi

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

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के द्वारा: arunsathi arunsathi

के द्वारा:

अरुण साथी जी आप धन्य है जो आपने कभी के राम सेवक यादव उर्फ़ बाबा राम देव उर्फ़ परम पूज्य, योग गुरु, उर्फ़ योगाचार्य, उर्फ़ संत सिरोमणि, के बारे में अपने विचार प्रकट किये और क्यों न करे आपकी आत्मा ने कहा और आत्मा की आवाज को कभी मारना नहीं चाहिए क्योंकि श्रधेय बाबा राम देव भी तो अपने सन्यासी चोले की आड़ में अपनी आत्मा की आवाज के बल पर सरकार को नित कोसते है की सरकार काले धन को विदेशो से वापस भारत लाये नहीं तो सरकार को उखाड़ फैन्केगे - परन्तु बाबा यह नहीं बताते की बाबा जो धर्मार्थ कार्य करते है उस धर्मार्थ कार्य वे बाबा के पास अकूत धन कैसे इकत्र हो गया है क्योंकि धर्मार्थ कार्यों में पैसा खर्च होता है पैसा एकत्र नहीं होता अगर किसी धर्मार्थ कार्य से धन एकत्र हो रहा है तो वह व्यापार ही तो है -इस लिए सबसे पहले तो बाबा को जनता को यह बताना चाहिए की बाबा की ट्रस्टों में जो अकूत धन लगा है उसमे कितना काला है और कितना सफेद है केवल आधा अधुरा अकाउंट वेब साईट पर उपलब्ध करा देने भर से कोई धन सफ़ेद नहीं हो जाता -- फिर स्कॉट लैंड में टापू खरीदने की बात हो वह पैसा कैसा है - इस्ससे एक बात बिलकुल साफ़ है की बाबा काले धन के विषय में बहुत अधिक जानकारी रखते है लेकिन श्रोत नहीं बताते यह तो रही बाबा की बात ? लेकिन हमारी समझ में एक बात यह नहीं आती की बाबा के भक्त क्योंकर आगबबुला हो जाते है जिस अभिव्यक्ति की आजादी के अंतर्गत बाबा राम देव सरकार पर आरोप लगते है और नित अपने अनर्गल विचार प्रकट करते है उसी अभिव्यक्ति की आजादी के अंतर्गत और भी बहुत लोगो को यह शक्ति मिली है इस लिए मंच के पर्बुद्ध विचारक पाठक ब्लॉगर जब अभद्र भाषा का प्रयोग करते है तो यह उनकी कुंठा को दर्शाता है की यह लोग बाबा के कितने अंध भक्त है - मन की सरकार पूर्ण रूप से भ्रष्ट है और उसे शासन करने का अधिकार नहीं होना चाहिए तो क्या यह अधिकार बाबा ने या उनके चेलों ने दिया यह अधिकार देश की जनता ने दिया है और जनता ही किसी भ्रष्ट सरकार को सजा देने में सक्षम है और ऐसी सरकार को सजा भी बरोबर मिलेगी ? लेकिन जहाँ कोई व्यक्ति ( जिसे यह नहीं मालूम की वह कितना भ्रष्ट है ) भगवा, सफ़ेद, या पिला -काला कपडा पहन कर उपदेश देता है तो मेरे जैसे व्यक्ति को तो ऐसा लगता है की कोई कव्वा हंस की चाल चल रहा है या कोई स्वयं आर्थिक अनियामामिताओं को करते हुए भ्रष्टाचार के विरुद्ध तिरंगा झंडा उठाकर मटक मटक कर मंच पर आचरण करता है तो लगता है नौ सो चूहे खा कर बिल्ली हज को जा रही है - फिर भी मैंने भी आलोचना ही की है मगर ऐसा लगता है की मंच के कुछ अति जागरूक सज्जनों को यह उचित नहीं लगेगी - मेरा उनसे अनुरोध है की महाराज शिवजी की तरह आचरण करें और गरल को पीने का अभ्यास करे तो उनको शांति प्राप्त होगी / क्योंकि इस लोक तंत्र में अगर आलोचना नहीं होगी तो राम राज्य कैसे आएगा इस लिए कबीर की बाणी का अनुसरण करे " निंदक नियररे रखिये आँगन कुटी छवाय | बिन पानी बिन साबुन के निर्मल करे सुहाय || धन्य वाद !!!!!

के द्वारा:

मान्यवर ,मुझे क्षमा करेंगे मैं ऐसे लेखों पर अमूमन प्रतिक्रिया नहीं देता हूँ परन्तु श्री संतोष कुमार का नाम देख कर पढ़ा और लिखने को मजबूर हुआ / लेख पढ़ा कर तो दुःख हुआ कि कैसे कैसे लेख जागरण जंक्शन पर आ रहें हैं , जिनका न तो कोई सिर है न पैर है , यह अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता का फल है / बिना किसी तर्क के बिना किसी आधार के , बिना किसी विचार के आप जैसे लोग लिख रहें हैं / पढ़ा कर दुःख हुआ कि आपकी पत्नी से लेकर दोस्त यार तक गरियाते हैं / आपका लेख आपकी निराशा का द्योतक है , नकारात्मक उर्जा को समाप्त करिए आपका हित होगा / किसने क्या बनाया , कैसे बनाया ,किसके द्वारा बनाया , उससे जनता का हित हो रहा है या नहीं पैसा कहाँ से आया इसका दुःख तो बहुतों को हो रहा है / आपको भी हुआ इसमे कोई आश्चर्य नहीं है / आपके लेख से लगा कि आप पेशे से पत्रकार हैं / पत्रकार तथ्यों के साथ अपनी बात कहता है / बाबा रामदेव के सम्बन्ध में तो तमाम जाँच एजेंसियां जाँच कर रही हैं परन्तु आपने तो फैसला पहले ही सुना दिया /मंच कि गरिमा को बनाये रक्खें / जो भी कहें तर्क पूर्ण कहें / वैसे मैं आपको कुछ कहने वाला कौन हूँ / आप दो दुनी पञ्च कहे इसमें किसी का क्या जाता है जैसा आपने लिखा गलियाने का मन कर रहा है , जब गली देने का मन हो तो कमरा बंद कर दे लिया करिए , इससे मन हल्का होगा /धन्यवाद /

के द्वारा: krishnashri krishnashri

अरुण साथी जी , आपको आहत करने से मैं भी दुखी और क्षमा प्रार्थी हूँ ,..लेकिन ,.जिस तरह से पूर्वाग्रह रखते हुए आपने लेख लिखा ,..शायद मैं क्रोध में आ गया था ,...सभी को मेरा स्तर समझाने के लिए आभार ,.मंच मंच की गरिमा के लिए आपसे विनती करूगा कि अनुचित बातों को हटा दें,... मुझे बिलकुल नहीं पता कि बाबा ने दवाई से कितना कमाया ,..ना ही मैं उनसे या उनके भी संगठन से जुड़ा हूँ,..और ना ही उनका भक्त हूँ ,..लेकिन कभी कभी उनके दवाओं सहित कुछ अन्य उत्पाद प्रयोग किये हैं ,.सभी मुझे बहुत अच्छे दाम में मिले ,..मैं आपसे कोई बहस भी नहीं चाहता हूँ ,.. यदि उचित समझें तो एक प्रश्न का उत्तर जरूर चाहूँगा,..एक सन्यासी सफलता के शिखर पर जाकर अपमान,तिरस्कार, प्रताड़ना का वरण क्यों कर रहा है ?....एक बार हारने के बाद भी सतत सकारात्मक प्रयास में लगे हैं,...बस मीडिया नहीं दिखा रही है ,....आपका कहना गलत है ,देश ने उनको ठुकराया बिलकुल नहीं है ,....उनके प्रयास रंग जरूर लायेंगे ..अनुचित शब्दों के लिए पुनः क्षमा प्रार्थी हूँ ,..सादर आभार

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

संतोष कुमार जी जब से आपका पोस्ट पढ़ा हूं तब से भारी तकलीफ में हूं। दर्द हुआ। फिर सोंचा कि आपकी ही भाषा में जबाब दूं फिर सोचा की नहीं आपने अपने जिस स्तर का प्रमाण दिया है वह आपको मुबारक हो और इसलिए मैं आपकी टिप्पणी को यहां रखे हुए हूं ताकि लोग देखें और समझ सकें कि आपका स्तर क्या है? आपने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह आपको मुबारक। रही बात मेरे आलेख की, तो अब मूल मुददे पर आता हूं। आप बता सकते है कि बाबा रामदेव ने कौन सा देश सेवा का काम किया है। दस रूपये का चुरण 100 मे ंबेचा, पंतजली को योग को व्यापार बना कर बेचा। यदि यही देश सेवा है तो आपको भगवान सदबुद्वि दे। और एक बात मैं कह दू कि आपके बाबा को भी इस देश में ठुकरा दिया और उनके आंदोलन जिस तरह से आम आदमी कम भागीदारी की उससे बाबा को समझ जाना चाहिए कि देश क्या चाहता है। रही बात जयचंद की, तो उसकी औलद वही लोग है जो अंग्रेजों के जाने के बाद भी देश को लूट रहे है। बैसे मन तो गलियाने का कर रहा है पर जब्त कर ले रहा हूं क्योकि मैं आज भी गांव में रहता है और यहां कि गाली आपके द्वारा दी गई गाली पर भारी ही पड़ेगी......

के द्वारा:

अरुण जी मामा ,..राम राम वैसे मुझे बाबा का भक्त मत समझना और मैंने कभी अठन्नी दान भी नहीं की है ,....इस मंच पर बड़े बड़े डाक्टर मौजूद हैं ,..और मैं वैसे भी दवाई नहीं देता हूँ ,..लेकिन क्या करें ...आपकी तकलीफ इतनी ज्यादा है ,..मुझसे देखा नहीं गया ................................................प्राथमिक उपचार तो फर्ज बनता है ,.. पहले तो यह बताओ ,.आप साथी किसके और क्यों हो ?... और आपको यह बवासीर जैसा दर्द कब से उठा,..बाबा के ट्रस्टों के पास जो भी धन है वो उन्होंने अपने पुरुषार्थ से अर्जित किया है और जनसेवा कर रहे हैं ,...लाखों करोड़ों लोगों को फायदा है ,..इससे आपके पेट में कब्ज हो तो तकलीफ तो बढ़ेगी ही ,.......असली तकलीफ यह भी नहीं है ,..जब एक सन्यासी ने राष्ट्रहित में हुंकार भरी ,.और आपके बापों के नीचे धरातल खिसकने लगा तो उन्होंने दिग्गी पोषित औलादों को याद किया ,..नतीजा आप दिखा ही रहे हैं ,... आपकी खाली खोपड़ी में यह बात कब घुसेगी की इस जयचंदी मानसिकता की वजह से ही हम आज भी तकरीबन गुलाम ही हैं ,...खैर जब तक अंग्रेजो की चाटकर पेट भरा जा सकता है तो कष्ट क्यों उठाओ ...पैसे कमाने के बहुत तरीके हैं ,...बहुतों ने माँ बहनों की दलाली कर करोडो कमाए हैं ,...आप भी चाहे तो ट्राई कर सकते हैं ,..वैसे काम में ज्यादा फर्क नहीं है ,.. बाबा रामदेव जी की देशसेवा को प्रणाम करता हूँ ,.यही कांग्रेसी उनके चरणों में पड़ते थे ,..सबकुछ प्राप्त करने के बाद देशहित में उन्होंने अपमान को स्वीकार किया है ,...त्याग किया है ,..यह बात आपकी समझ से बहुत ऊपर की है ,...जज्बा होगा तभी समझोगे ,...भगवान् आपका नशा जल्दी उतारे ,..धन्यवाद

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

................"भईया लादेन यदि भारत में होता तो उसकी भी ठाठ होती और अपनी भी आखिर हम धर्मनिरपेक्ष देश है"- - - - - - भाई आपका यह कथन (१०० प्रतिशत ) सोलह आने सच है इसमें इतनी माथा पच्ची करने की क्या जरूरत है क्योंकि यह भारत कि परम्परा रही है --अभी हम दो दिन बाद ही विष्णु जी के छटे आवतार श्री पशुराम जी की जयंती मानाने जा रहे है जिनके बारे में ग्रंथो में लिखा है कि उन्होंने अपने पिता कि आज्ञा पालन में अपनी माता का ही सर काट दिया था और पिता कि मृत्यु के बाद अपनी माँ द्वारा २१ बार छाती पीटने पर शपथ ली थी कि वह पृथ्वी से क्षत्रिय जाति का समूल ही नष्ट कर देंगे और उन्होंने ऐसा एक बार नहीं २१ बार पृथ्वी से क्षत्रियों का विनाश किया जब हम ऐसे घोर पापी अनाचारी व्यक्ति को महिमामंडित करते है तो क्या आप जैसे लोगों को शर्मिंदगी नहीं होती क्या यह आतांक की पराकाष्टा नहीं थी परशुराम के द्वारा? मातृ-पितृ भक्त परशुराम श्रीमद्भागवत में दृष्टांत है कि गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ विहार करता देख हवन हेतु गंगा-तट पर जल लेने गई माता रेणुका आसक्त हो गई। तब हवन-काल व्यतीत हो जाने से क्रुद्ध मुनि जमदग्निने पत्नी के आर्य मर्यादा विरोधी आचरण एवं मानसिक व्यभिचारवश पुत्रों को माता का वध करने की आज्ञा दी। अन्य भाइयों द्वारा साहस न कर पाने पर पिता के तपोबल से प्रभावित परशुराम ने उनकी आज्ञानुसार माता का शिरोच्छेदन एवं समस्त भाइयों का वध कर डाला, और प्रसन्न जमदग्नि द्वारा वर मांगने का आग्रह किए जाने पर सभी के पुनर्जीवित होने एवं उनके द्वारा वध किए जाने संबंधी स्मृति नष्ट हो जाने का ही वर मांगा।पिता जमदग्निका का मारा जाना और परशुराम का प्रतिशोध सहस्त्रार्जुन से युद्धरत परशुराम। कथानक है कि हैहय वंशाधिपति का‌र्त्तवीर्यअर्जुन (सहस्त्रार्जुन) ने घोर तप द्वारा भगवान दत्तात्रेय को प्रसन्न कर एक सहस्त्र भुजाएं तथा युद्ध में किसी से परास्त न होने का वर पाया था। संयोगवश वन में आखेट करते वह जमदग्निमुनि के आश्रम जा पहुंचा और देवराज इंद्र द्वारा उन्हें प्रदत्त कपिला कामधेनु की सहायता से हुए समस्त सैन्यदल के अद्भुत आतिथ्य सत्कार पर लोभवश जमदग्नि की अवज्ञा करते हुए कामधेनु को बलपूर्वक छीनकर ले गया।कुपित परशुरामजी ने फरसे के प्रहार से उसकी समस्त भुजाएं काट डालीं व सिर को धड से पृथक कर दिया। तब सहस्त्रार्जुन के दस हजार पुत्रों ने प्रतिशोधवश परशुराम की अनुपस्थिति में ध्यानस्थ जमदग्निका वध कर डाला। रेणुका पति की चिताग्नि में प्रविष्ट हो सती हो गई। क्षुब्ध परशुरामजी ने प्रतिशोधवश महिष्मती नगरी पर अधिकार कर लिया, इसके बाद उन्होंने इस पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियों से रहित कर दिया और हैहयों के रुधिर से स्थलंतपंचक क्षेत्र में पांच सरोवर भर दिए और पिता का श्राद्ध सहस्त्रार्जुन के पुत्रों के रक्त से किया। अन्त में महर्षि ऋचीक ने प्रकट होकर परशुराम को ऐसा घोर कृत्य करने से रोक दिया।तब उन्होंने अश्वमेघ महायज्ञ कर सप्तद्वीपयुक्त पृथ्वी महर्षि कश्यप को दान कर दी और इंद्र के समक्ष शस्त्र त्यागकर सागर द्वारा उच्छिष्ट भूभाग महेंद्र पर आश्रम बनाकर रहने लगे।

के द्वारा:

प्रिय अरुण, देशद्रोह होता है गरीबी के नाम पर ट्रेन में विस्फोट करना ,देशद्रोह है गरीबो की रक्छा के लिए घर परिवार से दूर जंगलो की खाक छानने वाले सिपाहियों को बारूदी सुरंग बिछा के उड़ाना देश द्रोह होता है अरबो के ऐ . के ४७ ,बोंम्ब बारूद खरीद कर देश के विरुद्ध जंग करना इतने पैसे में करोनो लोगो के लिए रोजगार हो सकता है ,पहले नोट के बदले वोट देकर सरकार चुनना फिर लगा की सरकार ठीक नहीं है उसे अपनी आवाज सुनाने के लिए बेगुनाह गरीब सिपाहियों की हत्या करना, अपने देश से घृणा करना और विदेशी ताकतों के इशारो पर देश के विरुद्ध युद्ध करना ,इसीलिए विनायक सेन देशद्रोही है. विनायक सेन मुर्दाबाद.जय हिंद जय भारत.

के द्वारा:




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